
// रूसी व्यंजन
शिशलिक
शिशलिक मांस के टुकड़े हैं जिन्हें सीख में पिरोकर कोयले पर भूना जाता है। यह नाम मूल रूप से मेमने के मांस के लिए था, पर आज इसी तरह सूअर, मुर्गी, मछली और सब्ज़ियाँ भी पकाई जाती हैं। मांस को सिरके, सूखी शराब या रस जैसे अम्लीय आधार में प्याज़ और मसालों के साथ मैरिनेट किया जाता है, जिससे तैयार व्यंजन रसीला और सुगंधित बनता है। शिशलिक गरमा-गरम परोसा जाता है, आमतौर पर हरी पत्तियों, सब्ज़ियों और चटनियों के साथ, और काकेशियन परंपरा में इसके साथ लावाश रोटी भी दी जाती है।
अच्छा शिशलिक किसी मसालों की सूची से नहीं, बल्कि उन कोयलों के प्रति धैर्य से बनता है, जिन्हें एक समान आँच तक दहकने देना चाहिए।
// सामग्री
- मेमने का मांस
- सूअर का मांस
- मुर्गी
- प्याज़
- सिरका
- काली मिर्च
- हरी पत्तियाँ
// ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
यह शब्द तुर्की भाषाओं से रूसी में आया: «शिश» का अर्थ है सीख या डंडा, और इसे क्रीमियन तातार के «शिशलिक» से जोड़ा जाता है। 18वीं सदी तक यह शब्द रूसी बोलचाल में पहले से मौजूद था। «शाम्पुर» शब्द अर्मेनियाई या जॉर्जियाई भाषा के रास्ते सीरियाई «šаррūδā» (भाला) से आया। 16वीं सदी में रूस में सीख पर भुना मांस जाना जाता था; पक्षियों और शिकार के पूरे शरीर सीख पर भूने जाते थे, पर यह व्यंजन केवल धनी लोगों की पहुँच में था।
एक मत के अनुसार खुली आग पर मांस भूनने का तरीका बहुत प्राचीन है, और मध्य पूर्व तथा काकेशस की घुमंतू जातियाँ ऐसे मांस का उपयोग मूर्तिपूजक अनुष्ठानों में भी कर सकती थीं। 19वीं सदी में काकेशस और क्रीमिया के रास्ते शिशलिक रूस में लोकप्रिय हुआ, और मॉस्को के भोजनालयों में इसे शहर की एक पसंदीदा व्यंजन के रूप में परोसा जाने लगा। सोवियत काल में शिशलिक प्रकृति में विश्राम और बगीचों की दावतों का हिस्सा बन गया। यह व्यंजन मई के त्योहारों और खुली हवा के मौसम से भी जुड़ा है। इसे अक्सर आतिथ्य और मिलकर पकाने का प्रतीक माना जाता है, जब कोयलों के चारों ओर एक टोली जमा होती है।























